यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की अद्वितीय गैंडा पुनर्वास परियोजना अफसरों की लापरवाही एवं उदासीनता का शिकार होकर कुप्रवन्धन की पर्याय बन गयी है । अब्यवस्थाओं के कारण उर्जाबाड़ से संरक्षित वनक्षेत्र में रहने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार के पांच सदस्य करंटयुक्त फैंसिंग तोड़कर बाहर जा चुके हैं। यह बात जानकर भी पार्क प्रशासन के अफसर गैंडों की सुरक्षा की कोई पुख्ता दीर्घकालिक व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। इससे उनके जीवन पर संकट मंडराता रहता है। इसके अतिरिक्त एक ही नर गैंडा की संतानों
पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा को 25 साल पहले तराई क्षेत्र की जन्मभूमि पर उनको बसाया गया था। किसी वन्यजीव को पुनर्वासित करने का यह गौरवशाली इतिहास विश्व में केवल दुधवा नेशनल पार्क ने बनाया है। भारत सरकार ने पहले आसाम के पावितारा वन्यजीव विहार से दो नर व तीन मादा गैंडा लाकर दुधवा में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू कराई थी। इसमें से दो मादा गैडों की मौत ‘शिफ्टिंग स्टेस‘ के कारण हो गई थी तब परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सन् 1985 में सोलह हाथियों के बदले नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से चार मादा गैंडों को लाया गया। विश्व की यह एकमात्र ऐसी परियोजना है जिसमें 106 साल बाद गैडों को उनके पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित कराया गया है। गंगा के तराई क्षेत्र में सन् 1900 में गैंडा का आखिरी शिकार इतिहास में दर्ज है, इसके बाद गंगा के मैदानों से एक सींग वाला भारतीय गैंडा विलुप्त हो गया था।
जनपद लखीमपुर-खीरी स्थित दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज के 27 वर्गकिमी के जंगल को उर्जाबाड़ से घेरकर अप्रैल 1984 में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की गई थी। तमाम उतार-चढ़ाव एवं साधनों व संसाधनों की कमी के बाद भी यह परियोजना काफी हद तक सफल रही है। स्वच्छंद विचरण करने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार का जीवन हमेशा खतरों से घिरा रहता है, क्योंकि इनकी रखवाली व सुरक्षा में तैनात पार्ककर्मियों को निगरानी करना तो सिखाया जाता है किंतु बाहर भागे गैंडा को पकड़कर वापस लाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। इन अव्यवस्थाओं के कारण विगत एक दशक से तीन नर एवं दो मादा गैंडा उर्जाबाड़ के बाहर दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र की गेरुई नदी के किनारे तथा गुलरा क्षेत्र के खुले जंगल समेत निकटस्थ खेतों में विचरण करके फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहें हैं। जबकि दुधवा रेंज कार्यालय से करीब चार किमी दूर चौखंभा वनक्षेत्र में गौरीफंटा रोड पर पहली बार एक गैंडा बिचरण करते देखा गया। अब यह गैडा सोठियाना रेंज के जंगल में असुरक्षित घूम रहा है। यह वनक्षेत्र दक्षिण सोनारीपुर के उर्जाबाड़ वाले इलाके से 15-20 किमी दूर है। गैंडा वहां तक कैसे पहुंचा? यह बात अपने आप में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है।
इस गैंडा की घर वापसी के कोई प्रयास पार्क प्रशासन द्वारा नहीं किए जा रहे हैं। दुधवा के जंगल के चारों तरफ किनारे पर तमाम गांव आबाद हैं और वनक्षेत्र से सटे खेतों में फैंस तोड़कर बाहर विचरण करने वाले गैंडा लगातार फसलों को भारी क्षति पहुंचा रहे हैं। बीते दशक में मलिनियां गांव के पास गैंडा एक किसान को मार चुका है। तथा अलग-अलग गैंडों द्वारा किए गए हमलों में पौन दर्जन लोग घायल हो चुके हैं। यूपी की सरकार ने वनपशुओं द्वारा की जाने वाली फसलक्षति व जनहानि की मुआवजा सूची में 25 साल ब्यतीत हो जाने के बाद भी गैंडा को उसमें शामिल नहीं किया है। इससे बन विभाग गैंडा द्वारा पहुंचाई जाने वाली फसल क्षति का मुआवजा नहीं देता है। फसलों का नुकसान व जनहानि होने के बाद भी उसकी भरपाई न मिलने से आक्रोषित ग्रामीण खुले जंगल और खेतों के आसपास घूमने वाले गैंडों को कभी भी क्षति पहुंचा सकते हैं। दुधवा पार्क प्रशासन द्वारा गैडों की मानीयटरिंग व उनकी सुरक्षा के लिए अलग से चार हाथी व कर्मचारियों का भारी अमला लगाया गया है। लेकिन रेंज और वन चौकियों पर मूलभूत सुविधाएं उपलव्ध न होने से कर्मचारी अपनी इस तैनाती को कालापानी वाली सजा मानते हैं। विषम परिस्थियों में वे ड्यूटी को पूरी क्षमता के बजाय बेगार के रूप में करते हैं। जिससे गैंडों के जीवन पर भारतीय ही नहीं वरन् नेपाली शिकारियों की कुदृष्टि का हर वक्त खतरा मंडराता रहता है। गैंडा परिक्षेत्र में बाघ के हमलों और गंभीर बीमारियों की चपेट में आने से अब तक गैंडा के आधा दर्जन बच्चे मौत की भेंट चढ़ चुके हैं। आए दिन नर गैंडो के बीच होने वाले प्रणय द्वन्द-युद्ध में गैंडों के घायल होने की घटनाएं होती रहती हैं। नर गैडों की ‘मीयटिंग फाइट’ में घायल हुई एक मादा गैंडा की उपचार के अभाव में असमय मौत हो चुकी है। जबकि दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर क्षेत्र में होने वाली मार्ग दुर्घनाओं में अक्सर वन्यजीव घायल होते रहते हैं, इसके बाद भी शासन ने अभी तक न दुधवा नेशनल पार्क में विशेषज्ञ पशु चिकित्सक का पद स्वीकृत किया है और न ही आज तक किसी पशु चिकित्सक की नियुक्ति की गई है।
दुधवा में अपने पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित बांके नामक पितामह गैंडा से हुई वंशबृद्धि से यहां तीस सदस्यीय गैंडा परिवार स्वच्छंद विचरण कर रहा है। एक ही पिता से हुई संतानें चार पीढ़ी तक पहुंच गई हैं। जिनके ऊपर विशेषज्ञों के अनुसार अनुवांषिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन -इनब्रीडिंग- का खतरा मंडरा रहा है। उनका मानना है कि अन्तःप्रजनन की विकट समस्या से निपटने के लिए यहां बाहर से गैंडा का लाया जाना जरुरी है। गौरतलब है कि दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किशनपुर वनपशु बिहार तथा नार्थ-खीरी वन प्रभाग की संपूर्णानगर बनरेंज के जंगल और उससे सटे खेतों में पिछले करीब एक साल से मादा गैंडा अपने एक बच्चे के साथ घूम रही है। बन विभाग एवं पार्क प्रशासन इसकी सुरक्षा एवं निगरानी करने के बजाय यह कहकर अपना पल्लू झटक रहा है कि यह गैंडा नेपाल की शुक्लाफांटा सेंक्चुरी का है, जो पीलीभीत के लग्गा-भग्गा जंगल से होकर आया है और घूम-फिर कर वापस चला जाएगा। पूर्व में जब यह परियोजना शुरू की गई थी तब सोलह हाथियों के बदले चार मादागैंडा नेपाल से लाए गए थे, अब एक नेपाली मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ घूम रही है तो फ्री में मिल रही इस मादा गैंडा को यहां के गैंडा परिवार में क्यों नहीं शामिल कराया जा रहा है? वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि प्रयास करके पार्क प्रशासन अगर इस मादा गैंडा को दुधवा के गैंडा परिवार में शामिल करा ले तो यहां के गैंडों के उपर मंडरा रहा इनब्रीडिंग यानी अंतःप्रजनन का खतरा आंशिक रूप से काफी हद तक टल सकता है। लेकिन पार्क के अफसर इस दिशा में कोई भी प्रयास नहीं कर रहे हैं। इससे लगता है कि पार्क प्रशासन गैंडा पुनर्वास परियोजना के प्रति कतई गंभीर नहीं है।
गैंडा पुनर्वास परियोजना के योजनाकारों ने तय किया था कि यहां की समष्टि में तीस गैंडा को लाकर बसाया जाएगा। उसके बाद फैंस हटाकर उनको खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। उनका यह सपना तो पूरा नहीं हुआ वरन् गैंडों की बढ़ती संख्या को देखकर समष्टि के बृहद फैलाव, आवागमन की सुविधा, अंतःप्रजनन रोकने एवं संक्रामक संहारक तत्वों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से दक्षिण सोनारीपुर में इस समष्टि के निकट नई फैंस बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद इस पर पांच साल पहले शुरू किया गया कार्य आज भी अधूरा पड़ा बजट आने का इंतजार कर रहा है। जर्जर हो चुकी 25 साल पुरानी उर्जाबाड अनुपयोगी हो गई है, लकड़ीचोर व शिकारी फैंस के तारों को काट देते हैं इससे भी गैंडो को बाहर निकलने में आसानी रहती है। वैसे भी गैंडों की बढ़ रही संख्या के अनुपात में अब उनके रहने वाले जंगल का भी क्षेत्रफल कम हो गया है। इसका क्षेत्रफल समय रहते बढ़ाया जाना आवश्यक हो गया है साथ ही गैंडों की मानीटरिंग के लिए अत्याधुनिक साधन व सुरक्षा
के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की बात भी पार्क अधिकारी कहते हैं। किंतु यहां की समस्याओं का समाधान करने में न केंद्र सरकार गंभीर है और न ही प्रदेश की कोई दिलचस्पी ले रही है। जिससे ब्याप्त तमाम अब्यवस्थाओं के कारण क्षेत्र में गैंडा और मानव के मध्य एक नया संघर्ष जरुर शुरू हो गया है। इसके बाद भी दुधवा पार्क प्रशासन द्वारा संरक्षित क्षेत्र के बाहर घूम रहे गैंडों की सुरक्षा एवं उनको फैंस के भीतर लाने के कतई कोई प्रयास नहीं किए जा रहें हैं। जिससे इन गैडों के जीवन पर हरवक्त खतरा मंडराता रहता है। इनके साथ कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है, इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
लोड हो रहा है...